हमारा संविधान हमारे देश की आधारशिला है जबकि गांधी का दर्शन भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की नैतिक और वैचारिक प्रेरणा का प्रमुख स्रोत रहा है। हालाँकि गांधीजी संविधान सभा के सदस्य नहीं थे और उन्होंने संविधान के निर्माण में प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाई फिर भी उनके विचारों का प्रभाव संविधान के अनेक मूल्यों और उद्देश्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। दूसरी ओर संविधान ने कुछ ऐसे सिद्धान्तों को भी अपनाया जो गांधीजी की कल्पना से उलट थे।
गांधीजी के विचारों और संविधान के बीच सबसे महत्वपूर्ण सामंजस्य सामाजिक न्याय और समानता के क्षेत्र में दिखाई देता है। गांधीजी ने जीवन भर अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष किया और समाज के वंचित वर्गों को सम्मानजनक जगह दिलाने की कोशिश की। हमारे संविधान ने इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए अनुच्छेद 17 के माध्यम से अस्पृश्यता को समाप्त घोषित किया तथा अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार दिया। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान भी सामाजिक न्याय के उसी आदर्श को मजबूत करते हैं जिसकी पैरवी गांधीजी करते थे।
अहिंसा और मानव गरिमा के प्रति प्रतिबद्धता भी दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। गांधीजी का सम्पूर्ण जीवन सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों पर आधारित था। उनका मानना था कि किसी भी संघर्ष का समाधान शांतिपूर्ण और नैतिक तरीकों से होना चाहिए। हालाँकि संविधान अहिंसा का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं करता फिर भी लोकतंत्र, मौलिक अधिकारों और शांतिपूर्ण राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से वह ऐसे मूल्यों को प्रोत्साहित करता है जो गांधीवादी सोच के अनुरूप हैं।
राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में भी गांधीवादी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। विशेष रूप से ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने और स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा देने की व्यवस्था गांधीजी की ग्राम स्वराज की अवधारणा से प्रेरित मानी जाती है। गांधीजी ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ गाँव आत्मनिर्भर हों और स्थानीय स्तर पर निर्णय लिए जाएं। बाद में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिए जाने से इस दिशा में और मजबूती आई। इसी प्रकार कुटीर उद्योगों और ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन देना भी गांधीजी के विचारों से मेल खाता है।
धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव के क्षेत्र में भी संविधान और गांधी दर्शन के बीच सामंजस्य देखा जा सकता है। गांधीजी सभी धर्मों को समान सम्मान देने में विश्वास रखते थे। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है तथा राज्य को सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करने का निर्देश देता है। यह व्यवस्था भारत की बहुलतावादी संस्कृति को मजबूत करती है और गांधीजी के सर्वधर्म समभाव के विचार को प्रतिबिंबित करती है।
लेकिन इन समानताओं के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण असामंजस्य भी हैं। गांधीजी राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे। उनका मानना था कि वास्तविक लोकतंत्र गाँवों से प्रारम्भ होना चाहिए और केंद्रीय सत्ता की भूमिका सीमित होनी चाहिए। इसके विपरीत भारतीय संविधान ने एक मजबूत केंद्र सरकार की स्थापना की जिसके पास व्यापक अधिकार हैं। यद्यपि स्थानीय स्वशासन को मान्यता दी गई है फिर भी भारत की शासन व्यवस्था मुख्यतः केंद्रीकृत और प्रतिनिधिक लोकतंत्र पर आधारित है जो गांधीजी की ग्राम स्वराज की परिकल्पना से पूरी तरह मेल नहीं खाती।
आर्थिक दृष्टि से भी गांधीजी और संविधान के बीच अंतर दिखाई देता है। गांधीजी आत्मनिर्भरता, सादगी और कुटीर उद्योगों पर आधारित अर्थव्यवस्था के समर्थक थे। वे बड़े पैमाने के औद्योगीकरण को लेकर आशंकित थे क्योंकि उनका मानना था कि इससे सामाजिक असमानताएँ बढ़ सकती हैं। स्वतंत्र भारत ने इसके विपरीत औद्योगिक विकास, बड़े कारखानों, आधुनिक तकनीक और अवसंरचना निर्माण को आर्थिक प्रगति का आधार बनाया। इसलिए विकास का संवैधानिक और नीतिगत ढाँचा गांधीजी की आर्थिक दृष्टि से काफी अलग रहा।
इसके अतिरिक्त गांधीजी सामाजिक परिवर्तन के लिए नैतिक मूल्यों और आत्मानुशासन को अधिक महत्व देते थे। उनका विश्वास था कि समाज में सुधार कानूनों से अधिक व्यक्ति के चरित्र और नैतिक चेतना से आएगा। दूसरी ओर संविधान अधिकारों, संस्थाओं और कानूनी व्यवस्थाओं के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक जीवन को संचालित करता है। यह एक व्यावहारिक और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण है, जो गांधीजी की नैतिक परिवर्तन की अवधारणा से कुछ भिन्न है।
अंत में यह कहा जा सकता है कि जहाँ भारतीय संविधान और महात्मा गांधी का दर्शन अनेक मूलभूत मूल्यों, जैसे सामाजिक न्याय, समानता, धार्मिक सद्भाव और जन भागीदारी के स्तर पर एक-दूसरे के पूरक हैं वहीं राजनीतिक संरचना, आर्थिक विकास के मॉडल और राज्य की भूमिका जैसे विषयों पर दोनों के बीच स्पष्ट अंतर भी मौजूद हैं। एक ओर हमारा संविधान आधुनिक राष्ट्र-राज्य के संचालन का व्यावहारिक ढाँचा प्रस्तुत करता है तो दूसरी ओर गांधीजी का दर्शन उसे नैतिक दिशा प्रदान करता है। हमारे लोकतंत्र की यात्रा में दोनों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है और यही उनके स्थायी महत्व का प्रमाण है।
