सभ्यताएँ भूख से नहीं मरतीं

sabhyataen

साल 1968 में अमेरिकी एथॉलॉजिस्ट जॉन बी. कैलहून ने एक ऐसा प्रयोग आरम्भ किया जिसने दशकों तक समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों और चिंतकों को सोचने पर मजबूर किया। इस प्रयोग का नाम था यूनिवर्स 25।

उन्होंने चूहों के लिए एक ऐसा संसार रचा जहाँ अभाव का कोई अस्तित्व नहीं था। भोजन असीमित था, पानी भरपूर था, तापमान अनुकूल था, शिकारी नहीं थे और आश्रय के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध था। मानो जीवन की हर भौतिक आवश्यकता पहले से ही सुनिश्चित कर दी गई हो। इस कृत्रिम स्वर्ग में चार नर और चार मादा चूहों को छोड़ा गया।

शुरुआती वर्षों में सब कुछ आदर्श दिखाई दिया। जनसंख्या तेजी से बढ़ी और कुछ ही समय में हजारों तक पहुँच गई। लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी, इस स्वर्ग की दरारें भी उभरने लगीं। सहयोग की जगह संघर्ष ने ले ली। हिंसा बढ़ने लगी। मातृत्व का सहज भाव कमजोर पड़ गया। कई मादाएँ अपने बच्चों की उपेक्षा करने लगीं, कुछ उन पर हमला तक करने लगीं। सामाजिक संबंधों का जाल जो किसी भी समुदाय को जीवित रखता है धीरे-धीरे बिखरने लगा।

इसी दौर में चूहों का एक विचित्र वर्ग उभरा, जिसे कैलहून ने “द ब्यूटीफुल वन्स” नाम दिया। ये चूहे न लड़ते थे, न साथी बनाते थे और न ही प्रजनन में रुचि लेते थे। उनका जीवन केवल भोजन करने, सोने और अपने शरीर को सहेजने तक सीमित हो गया था। वे स्वस्थ दिखते थे, आकर्षक भी थे, परंतु समुदाय के जीवन और भविष्य से उनका कोई संबंध नहीं रह गया था। वे जीवित थे, किंतु किसी बड़े उद्देश्य से कट चुके थे।

धीरे-धीरे जन्म दर लगभग शून्य पर पहुँच गई। समाज की संरचना टूट चुकी थी। कुछ बचे हुए माता-पिता भी नई पीढ़ी को संभाल नहीं पा रहे थे। फिर जो हुआ, वह चौंकाने वाला था। भोजन की कोई कमी नहीं थी, पानी प्रचुर मात्रा में था, फिर भी कॉलोनी का पतन शुरू हो गया। चार वर्ष और दस महीनों के भीतर उस समृद्ध संसार का अंतिम चूहा भी काल-कवलित हो गया।

कैलहून का मानना था कि यह प्रयोग मानव समाज के लिए एक रूपक की तरह देखा जा सकता है। उनका तर्क था कि केवल भौतिक समृद्धि किसी समाज को जीवंत और स्थायी नहीं बना सकती। किसी समुदाय को टिकाए रखने के लिए सार्थक भूमिकाएँ, सामाजिक संबंध, जिम्मेदारियाँ, उद्देश्य और भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता भी उतनी ही आवश्यक हैं। हालांकि अनेक आधुनिक शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि चूहों के व्यवहार को सीधे मनुष्यों पर लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि मानव समाज कहीं अधिक जटिल, रचनात्मक और अनुकूलनशील है, फिर भी यह प्रयोग कुछ असहज प्रश्न छोड़ जाता है।

आज इटली, ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे समाजों को देखिए। अभूतपूर्व समृद्धि, सुविधाएँ और लंबी आयु के बावजूद इन देशों की जन्म दर लगातार गिर रही है। यूरोप के अनेक गाँव और कस्बे जनसंख्या की कमी से खाली हो रहे हैं। पूर्वी एशिया में अनेक घर और संपत्तियाँ वर्षों से बिना उत्तराधिकारियों के खड़ी हैं। आर्थिक उपलब्धि अपने चरम पर है, पर जनसांख्यिकीय भविष्य को लेकर चिंता भी उतनी ही गहरी है।

भारत अभी उस मुकाम पर नहीं पहुँचा है, लेकिन महानगरों और उच्च आय वर्ग के जीवन में इसके कुछ शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं। व्यक्तिगत सफलता बढ़ी है, पर परिवार, समुदाय और दीर्घकालिक सामाजिक उत्तरदायित्वों से दूरी भी बढ़ रही है।

शायद यूनिवर्स 25 का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि सभ्यताएँ केवल भूख से नहीं मरतीं। कभी-कभी वे अत्यधिक तृप्ति से भी कमजोर पड़ जाती हैं।

क्योंकि इतिहास में कई बार यह देखा गया है कि अभाव संघर्ष को जन्म देता है, संघर्ष उद्देश्य को, और उद्देश्य जीवन को। पर जब हर आवश्यकता बिना प्रयास पूरी होने लगे, तब धीरे-धीरे उद्देश्य का क्षरण शुरू हो सकता है।

अत्यधिक आराम विनाश को आमंत्रित करता है।
अत्यधिक प्रचुरता भी कभी-कभी उसी दिशा में ले जाती है।

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