जब रेलवे तांगा, इक्का और खच्चर भी चलाता था

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सुनने में अजीब लग रहा है न! आज से तकरीबन सवा सौ साल पहले नैनीताल उस समय के हिसाब से काफी कुछ बस गया था। रेलवे लाइन काठगोदाम तक पहुँच गई थी। रूहेलखंड और कुमायूँ रेलवे बरेली जंक्शन से दो ट्रेनें नियमित चलाती थी, एक सुबह में और एक आधी रात को।

मोटर वाहनों का  भारत में अभी पदार्पण नहीं हुआ था। नैनीताल सचमुच दुर्गम जगह थी। लेकिन यूपी (यूनाइटेड प्राविन्सेज ऑफ आगरा एण्ड अवध) की सरकार नैनीताल से अप्रैल से अक्टूबर तक काम करने लगी थी। स्कूल, बैंक, अस्पताल और होटल खुल चुके थे। सैलानी भी पहुँचने लगे थे।

अब सवाल यह था कि लोग नैनीताल पहुँचे तो कैसे पहुँचे। काठगोदाम से नैनीताल तक 22 मील लंबा गाड़ी मार्ग बन चुका था। गाड़ी मार्ग बनने के साथ यात्रा सुविधाजनक तांगे में शुरू हो गई जबकि यात्रियों का सामान अभी भी कुली या खच्चर की पीठ पर 13 मील लंबे घोड़ा मार्ग से ले जाया जाता था।

अगर किसी को तांगे में यात्रा करनी होती थी तो उसे यात्रा के कुछ दिन पहले तांगा या तांगे में सीट बुक करनी होती थी। तांगा बुक करने के लिए तांगा सुपरिन्टेंडेंट काठगोदाम को को सूचना देनी होती थी और भुगतान तांगे पर बैठने के पहले करना होता था। एक तांगे में सिर्फ तीन मुसाफिर बैठ सकते थे और हर एक यात्री 20 सेर तक वजन ले जा सकता है। न ज्यादा लोग बैठ सकते थे और न ज्यादा वजन ले जाया जा सकता था क्योंकि इनका निर्धारण स्टेज कैरिज ऐक्ट से होता था और तांगों के लाइसेन्स भी इसी ऐक्ट से विनियमित होते थे। ये तांगे रूहेलखंड और कुमायूँ रेलवे संचालित करता था।

काठगोदाम से नैनीताल के तांगे की एक सीट 4 रुपए 8 आने में मिलती थी, लेकिन पूरा तांगा 12 रुपए में मिल जाता था। घोड़े पर जाने के लिए 3 रुपए 8 आने देने होते थे। खच्चर पर सामान ढुलाई 14 आने में हो जाती थी, लेकिन कुली को 7 आने से ही संतोष करना होता था।

तांगे के उलट घोड़े, खच्चर और कुली के लिए पहले से खबर नहीं देनी होती थी। सामान बुक करने के लिए काठगोदाम स्टेशन पर कुली जमादार होता था। वह बाकायदा छपी हुई रसीद देता था जिसमें सामान की संख्या और वजन हाथ से लिखे जाते थे।

काठगोदाम से नैनीताल की दूरी तांगे से तय करने में करीब 5 घंटे लगते थे। बरेली से काठगोदाम की  उस समय की सुबह की ट्रेन काफी तेज थी। करीब 66 मील की यात्रा साढ़े तीन घंटे में पूरी करती थी। आज लखनऊ काठगोदाम एक्सप्रेस इसी यात्रा को करीब चार घंटे में पूरी करती है। 

Kathgodam Railway Station Photo from Internet. Excerpted from the book “A Guide to Naini Tal and Kumaun” by CW Murphy, Printed at The Pioneer Press, Allahabad, 1906.

1 thought on “जब रेलवे तांगा, इक्का और खच्चर भी चलाता था”

  1. Indu Prakash Sharma

    आज यह १०० साल बीत चुके हैं जिस यात्रा का विवरण आपने लिखा है सोच कर रोमांच से भर गया है , बहुत सुंदर लेख है।

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