कड़वी दवा

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बड़ी हैरानी हुई इस संपादकीय को पढ़कर। अगर टाइम्स आफ इंडिया और इस समूह के अखबार और पत्रिकाएं नहीं चाहते हैं कि गूगल उनकी मेहनत की मलाई काटे तो इसका बहुत आसान तकनीकी समाधान है। सर्च इंजन को कोई भी वेब पेज न सूचीबद्ध कर सके इसके लिए वेब पेज में एक मामूली कोड डालना होता है। तब कोई भी सर्च इंजन इसे सूचीबद्ध नहीं करेगा और कोई भी आपकी मलाई नहीं काटेगा।

लेकिन मामला इतना आसान नहीं है। ये चाहते हैं कि सर्च इंजन पर भी बने रहें और सर्च इंजन अपने विज्ञापनों में से इन्हें कमीशन भी देता रहे। आप अपना केक रखना भी चाहते हैं और खाना भी चाहते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है।

वैसे भी आप मुक्त व्यापार और बाजार की ताकतों के हिमायती हैं। आपको वे सारे कानून अवरोध और दकियानूसी लगते हैं जो आपको नहीं सुहाते। आप समाचार पत्र उद्योग में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले वेज बोर्डों के कट्टर विरोधी रहे हैं। आप सरकार के वेतन आयोगों के भी विरोधी रहे हैं। आपका पूरा नजरिया एकाधिकारवादी था और है।

आपने एमआरटीपी एक्ट (अब अस्तित्व में नहीं) को धता बताकर दूसरी कंपनी (जन सेवक कार्यालय) को लाइसेंस देकर लखनऊ में अपना अखबार निकाला। आपने आधे अधूरे नाम (The Times) के साथ बैंगलोर और पटना से प्रकाशन शुरू किया। आप जहां-जहां गए वहां-वहां आपने प्रतिद्वंदियों को खतम किया। निश्चित रूप से आप एमआरटीपी एक्ट के उत्तराधिकारी कम्पटीशन एक्ट के भी विरोधी होंगे।

एक महीने पहले तक आप किसी को अपने आगे गिनते नहीं थे। महज 30 दिनों के अंदर आपकी हवा इतनी निकल गई कि आपके मालिक ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख मारी। ये वही मालिक हैं जिन्होंने संपादक की गरिमा को यह कह कर रसातल में पहुंचा दिया था कि अगर मैं कुत्ते को भी संपादक बना दूं तो भी मेरा अखबार बिकेगा। जब आपको प्रधानमंत्री के यहां से कोई राहत नहीं मिली तो आपने लंबा चौड़ा संपादकीय लिख मारा।

आज आपको आपकी ही कड़वी दवा की खुराक पीते और उस पर आपकी प्रतिक्रिया को देखना काफी रोचक लग रहा है।

2 thoughts on “कड़वी दवा”

  1. मीडिया के अंदर की स्थितियों को मुझसे बेहतर आप जानते हैं। ये लोकतंत्र का सबसे ज्यादा अवसरवादी स्तम्भ है। अपने फायदे के लिए कब किसके तलुए चाटने हैं और किसका गुणगान करना है, ये सब अच्छे से जानते हैं। अभी भी कितने मीडियाकर्मी मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे हैं और उससे बचने के लिए इन्होंने नीचता की हदों को जिस तरह से पार किया है, ये भी किसी से छुपा नहीं है।

  2. टेस्ट औफ़ योर ओन मेडिसिन वाली कहावत सत्यार्थ हो गयी यहाँ पर सरजी ।।

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